श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  1.3.77 
नाहम् आत्मानम् आशासे
मद्-भक्तैः साधुभिर् विना
श्रियम् आत्यन्तिकीं वापि
येषां गतिर् अहं परा
 
 
अनुवाद
"मैं उन साधु पुरुषों के बिना, जिनके लिए मैं ही एकमात्र गंतव्य हूँ, अपने दिव्य आनंद या अपने परम ऐश्वर्य का आनंद लेने की इच्छा नहीं रखता।"
 
"I do not desire to enjoy My transcendental bliss or My supreme opulence without the saintly persons for whom I am the only destination."
तात्पर्य
यह श्लोक, जो श्रीमद् भागवतम (9.4.64) के नवमे सर्ग में सर्वोच्च भगवान द्वारा दुर्वासा मुनि से बोला गया है, सामान्य तौर पर वैष्णवों की महानता स्थापित करने के लिए उद्धृत किया गया है। अपने धरती या अन्यत्र स्थित शुद्ध भक्तों के प्रति ईश्वर व्यक्तित्व को अत्यधिक संतुष्टि प्राप्त होती है, और इसके विपरीत उनका आकर्षण वैकुंठ में अपनी ही पत्नी या उनके द्वारा उनकी प्रसन्नता के लिए बनाई गई अविनाशी संपन्नता की ओर उतना नहीं होता। वह स्वयं अपनी सुंदरता से उतने आकर्षित नहीं होते हैं। जैसा कि भगवान ने आगे दुर्वासा को बताया:

अहं भक्त-पराधीनो

ह्यस्वतंत्र इव द्विज

साधुभिर्गृस्त-हृदयो

भक्तैर्भक्त-जना-प्रियः

“मैं अपने भक्तों के पूर्ण नियंत्रण में हूँ। वास्तव में, मैं स्वतंत्र बिलकुल नहीं हूँ। क्योंकि मेरे भक्त भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह रहित हैं, मैं सिर्फ उनके हृदयों की गहराइयों में ही निवास करता हूँ। मेरे भक्तों की तो बात ही छोड़िए, मेरे भक्तों के भक्त भी मुझे बहुत प्रिय हैं।”

मयी निर्वद्ध-हृदयाः

साधवाः सम-दर्शिनः

वशे कुर्वन्ति माम भक्त्या

सत-स्त्रियाः सत्-पतिं यथा

“जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने सज्जन पतियों को सेवा द्वारा अपने वश में ले आती हैं, सच्चे भक्त, जो सभी के लिए समान हैं और मेरे प्रति पूरी तरह से हृदय की गहराइयों में जुड़े होते हैं, मुझे अपने पूर्ण नियंत्रण में ले आते हैं।” (भागवतम् 9.4.63, 66)

उद्धव ने श्री कृष्ण से भी ऐसे ही शब्द सुने थे:

न तथा मे प्रिय-तम

आत्म-योनिर्नशंकरः

न च संकर्षणो न श्रीः

नैवात्मा च यथा भवान

“मेरे प्रिय उद्धव, न तो भगवान ब्रह्मा, न भगवान शिव, न भगवान संकर्षण, न भाग्य की देवी, और न ही वास्तव में मेरा अपना ही स्वरूप तुम जैसा प्रिय है।” (भागवतम् 11.14.15) श्रील सनातन गोस्वामी ने टिप्पणी की है कि भागवतम के इस श्लोक में, श्री कृष्ण का उद्देश्य यह सामान्य बयान देना था कि कोई और उनके लिए उनके शुद्ध भक्तों जितना प्रिय नहीं है, लेकिन क्योंकि कृष्ण अपने भक्तों के विशिष्ट गुणों के बारे में सोचते हुए बहुत खुशी से भर गए थे, इसलिए “मेरे भक्त” कहने के बजाय उन्होंने अनजाने में “तुम, उद्धव" कह दिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)