श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.3.66 
या विहायादरेणापि
भजमानान् भवादृशान्
वव्रे तपोभिर् आराध्य
निरपेक्षं च तं प्रियम्
 
 
अनुवाद
आप जैसे लोगों की उपेक्षा करके, जो उसे बड़े आदर से पूजते हैं, उसने अपने प्रिय भगवान की पूजा करने के लिए कठोर तपस्या करने की प्रतिज्ञा की, भले ही वह उसके प्रति उदासीन थे।
 
Ignoring people like you, who worship him with great respect, he vowed to perform severe penance to worship his beloved Lord, even though He was indifferent to him.
तात्पर्य
केवल भगवान की भक्ति ही देवी लक्ष्मी का ध्यान आकर्षित कर सकती है जो भगवान नारायण की पवित्र भक्ति से पूजा करती है। वह स्वेच्छा से किसी भी कठिनाई और किसी भी साधारण सेवा को उसे प्रसन्न करने के लिए स्वीकार करती है, हालांकि वह स्वयं संतुष्ट होने के कारण अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। कई वैष्णव परिपूर्ण समर्पण के उदाहरण के लिए माता लक्ष्मी की ओर देखते हैं, उनके चरणों का अनुसरण करने की उम्मीद करते हैं। उदाहरण के लिए, कालिया नाग की पत्नियाँ श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं:

“हे प्रभु, हम नहीं जानते कि सर्प कालिया ने आपके चरणों की धूल से छूने का यह महान अवसर कैसे प्राप्त किया। इसी उद्देश्य के लिए, भाग्य की देवी ने सदियों तक तपस्या की, अन्य सभी इच्छाओं को त्याग दिया और कठोर व्रत लिए।" (भागवतम 10.16.36)

सर्वोच्च देवी महा-लक्ष्मी वैकुंठ के भगवान की शाश्वत प्यारी है; उसे उसे प्राप्त करने के लिए उसकी पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु उसके विस्तार नारायण के विभिन्न अवतारों के साथ उसके साथ रहने के लिए अवतार बनाते हैं, और महा-लक्ष्मी के इन अवतारों में से कुछ, जैसे कि भृगु मुनि की पुत्री, को वेद शास्त्रों में अपने पति के रूप में भगवान को प्राप्त करने के लिए तपस्या करने के लिए वर्णित किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)