अथ भागवता यूयं
प्रियाः स्थ भगवान् यथा
न मद् भागवतानां च
प्रेयान अन्योऽस्ति कर्हिचित
"तुम सभी प्रभु के भक्त हो, और इसलिए मैं इस बात की सराहना करता हूँ कि तुम परमेश्वर के समान ही आदरणीय हो। मैं जानता हूँ कि भक्त भी इस तरह से मेरा सम्मान करते हैं और मैं उन्हें प्रिय हूँ। इस प्रकार कोई भी भक्तों को उतना प्रिय नहीं हो सकता जितना कि मैं हूँ।" (भागवतम् 4.24.30)
