श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.3.57 
ऋण-त्रयाद् अनिर्मुक्ता
वेद-मार्गातिगा अपि
हरि-भक्ति-बलावेगाद्
अकुतश्चिद्-भयाः सदा
 
 
अनुवाद
भले ही उन्होंने अपने तीन ऋण नहीं चुकाये हों और इस प्रकार वैदिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हों, तो भी भगवान हरि की भक्ति के बल पर वे सदैव निर्भय रहते हैं।
 
Even though he has not repaid his three debts and is thus violating the Vedic rules, he always remains fearless by the power of devotion to Lord Hari.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)