श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.3.43 
यैः सर्वं तृण-वत् त्यक्त्वा
भक्त्याराध्य प्रियं हरिम्
सर्वार्थ-सिद्धयो लब्ध्वा-
पाङ्ग-दृष्ट्यापि नादृताः
 
 
अनुवाद
उन्होंने सब कुछ तुच्छ तिनके के समान त्याग दिया है। अपने प्रिय भगवान हरि की शुद्ध भक्ति से आराधना करते हुए, उन्हें इस संसार की इच्छित सिद्धियों का कोई आदर नहीं है; वे उन सिद्धियों की ओर दृष्टि भी नहीं डालते।
 
He has discarded everything like a mere straw. Worshiping his beloved Lord Hari with pure devotion, he has no regard for the desired accomplishments of this world; he does not even look at them.
तात्पर्य
कुछ भक्त हमेशा से वैकुण्ठ के निवासी रहे हैं और अन्य भौतिक जगत से वैकुण्ठ में ऊपर उठाए जाते हैं। साधना-सिद्ध वैष्णवों द्वारा वैकुण्ठ प्राप्ति के लिए आत्मसमर्पण की प्रक्रिया भी गौरवशाली है। सफल साधक भगवान विष्णु को वेदों के धार्मिक सिद्धांतों और योग की रहस्यमयी संपूर्णता सहित सफलता के हर दूसरे साधन की उपेक्षा करके, केवल उन्हीं पर अपनी भक्ति को केन्द्रित करके उनका पक्ष आकर्षित करते हैं। जब भौतिक संपूर्णताएं स्वाभाविक रूप से अनन्य भक्ति के द्वितीयक प्रभावों के रूप में उन्नत वैष्णवों के पास आती हैं, तो वैष्णव उन पर कोई ध्यान नहीं देते हैं, जैसे कि ये खजाने जिन्हें प्राप्त करने के लिए दूसरे संघर्ष करते हैं, बेकार कूड़ा हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)