श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.3.37 
लोकेशो ज्ञान-दो ज्ञानी
मुक्तो मुक्ति-प्रदो ’प्य् अहम्
भक्तो भक्ति-प्रदो विष्णोर्
इत्य्-आद्य्-अहङ्-क्रियावृतः
 
 
अनुवाद
मैं अनेक मिथ्या पहचानों से आच्छादित हूँ। मैं स्वयं को ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वज्ञ ज्ञानदाता, मुक्त मोक्षदाता, भगवान विष्णु की भक्ति का समर्पित दाता मानता हूँ।
 
I am covered with many false identities. I consider myself the Lord of the universe, the omniscient giver of knowledge, the granter of liberation, and the devoted giver of devotion to Lord Vishnu.
तात्पर्य
कोई सोच सकता है कि मिथ्या अहंकार का सार्वभौमिक नियंत्रक इसके प्रभाव के प्रति प्रतिरक्षित होना चाहिए। भगवान शिव अब इसे नकारते हुए खुद को अहंकार के अधीन बताते हैं। वे कहते हैं कि वह भी खुद को विष्णु के प्रिय भक्त और विष्णु की विशेष कृपा के पात्र के रूप में देखते हैं; और ऐसी मानसिकता, उनके हिसाब से, मिथ्या अहंकार का एक और प्रभाव है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)