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श्लोक 1.3.30  |
दृष्टो ’द्य भगवद्-भक्ति-
लाम्पट्य-महिमाद्भुतः
तद् भवान् एव कृष्णस्य
नित्यं परम-वल्लभः |
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| अनुवाद |
| आज मैंने अंततः परम प्रभु की शुद्ध भक्ति में आपकी अद्भुत अदम्य उत्सुकता देखी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कृष्ण सदैव आपसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। |
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| Today I have finally witnessed your amazing, indomitable eagerness for pure devotion to the Supreme Lord. No wonder Krishna always loves you the most. |
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