श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.3.24 
भवांश् च वैष्णव-द्रोहि-
गार्ग्यादिभ्यः सु-दुश्चरैः
तपोभिर् भजमानेभ्यो
नाव्यलीकं वरं ददे
 
 
अनुवाद
जब गार्ग्य जैसे वैष्णव शत्रुओं ने घोर तपस्या करके आपकी आराधना की, तब आपने उन्हें जो आशीर्वाद दिए, वे भी त्रुटिपूर्ण थे।
 
When Vaishnava enemies like Gargya performed severe penance and worshipped You, the blessings You gave them were also flawed.
तात्पर्य
क्योंकि गार्ग्य और अन्य यादवों और पाण्‍डवों के प्रति द्वेषपूर्ण थे, जो सभी कट्टर वैष्णव थे, भगवान शिव ने उनकी आराधना को अपूर्ण वरदानों से पुरस्कृत किया। बृहद-आरण्यक उपनिषद (2.1) के अनुसार, गार्ग्य बालकी ऋषि गर्ग का एक विद्वान पुत्र था जो अपने अर्जित ज्ञान पर बहुत गर्व करता था। भगवान शिव के आशीर्वाद से, गार्ग्य को एक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन ऐसा कोई नहीं जो यादव वंश को नष्ट कर सके, जैसा कि गार्ग्य चाहता था - केवल वही जो यादवों को डरा और निराश कर सके। इसी तरह, जयद्रथ को सीमित वरदान मिला कि वह अर्जुन को छोड़कर, एक बार में केवल एक पाण्‍डव को हरा सकता है। सुदक्षिणा को अपनी पसंद के किसी भी दुश्मन को नष्ट करने की अनुमति दी गई थी जो ब्राह्मणवादी संस्कृति का उचित अनुयायी नहीं था, लेकिन यह शक्ति अंततः उसके ख़िलाफ़ हो गई। भगवान शिव के इन असहाय भक्तों की पूरी कहानियाँ श्री हरि-वंश, विष्णु पुराण और श्रीमद-भागवतम में दर्ज हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)