श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.3.23 
सद्यो हित्वा रुषं प्रीतो
दत्त्वा निज-स्वरूपताम्
भवत्-पार्षदतां निन्ये
तं दुरापां सुरैर् अपि
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण ने तुरन्त अपना क्रोध दूर कर दिया। प्रसन्न होकर उन्होंने बाण को अपने समान रूप प्रदान किया और उसे आपका एक पार्षद बना दिया, जो पद देवताओं को भी दुर्लभ है।
 
Lord Krishna immediately dispelled his anger. Pleased, he gave Bana a form similar to his own and appointed him as one of your councilors, a position rare even for the gods.
तात्पर्य
बाणासुर से युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने बाण (अपने पुत्र के शत्रु) को मारने के लिए अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया था लेकिन उस समय भगवान शिव ने बीच-बचाव किया। विष्णु और वैष्णवों के विरुद्ध बाण के पापों की बड़ी सूची होने के बावजूद, बाण के नाम एक यही श्रेय था कि वह भगवान शिव का सच्चा भक्त था। इससे भगवान कृष्ण इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बाण को भी अपनी तरह चार भुजाओं वाला बना दिया। तब श्री कृष्ण ने भगवान शिव से कहा:

चतुर्वा अस्य भुजा शिष्टा भविषयत्य जररामरः

पार्षद मुख्या भवतो न कुतश्चित भयो असुरः

"अभी भी जिसके पास चार भुजाएँ हैं, वह राक्षस जरा और मृत्यु से मुक्त होगा, और वह आपके प्रमुख सेवकों में से एक बनेगा। इस प्रकार उसे किसी भी कारण से कुछ भी भय नहीं होगा" ( भागवतम 10.63.49)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)