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श्लोक 1.3.17  |
अनन्तरम् उवाचोच्चैः
स-विस्मयम् अहो मुने
दुर्वितर्क्य-तरं लीला-
वैभवं दृश्यतां प्रभोः |
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| अनुवाद |
| फिर उन्होंने आश्चर्य भरे स्वर में नारदजी से कहा, "परमेश्वर की लीलाओं की अत्यन्त अज्ञेय शक्ति तो देखो! |
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| Then he said to Narada in a surprised tone, “Look at the utterly incomprehensible power of the Supreme Lord’s pastimes! |
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