श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 1-4
 
 
श्लोक  1.3.1-4 
श्री-परीक्षिद् उवाच
भगवन्तं हरं तत्र
भावाविष्टतया हरेः
नृत्यन्तं कीर्तयन्तं च
कृत-सङ्कर्षणार्चनम्

भृशं नन्दीश्वरादींश् च
श्लाघमानं निजानुगान्
प्रीत्या स-जय-शब्दानि
गीत-वाद्यानि तन्वतः

देवीं चोमां प्रशंसन्तं
कर-तालीषु कोविदाम्
दूराद् दृष्ट्वा मुनिर् हृष्टो
’नमद् वीणां निनादयन्

परमानुगृहीतो ’सि
कृष्णस्येति मुहुर् मुहुः
जगौ सर्वं च पित्रोक्तं
सु-स्वरं समकीर्तयत्
 
 
अनुवाद
श्री परीक्षित बोले: शिवलोक पहुँचकर, दूर से नारद मुनि ने भगवान शिव, श्रीहर को देखा, जिन्होंने अभी-अभी भगवान संकर्षण, श्रीहरि की पूजा समाप्त की थी। भावविभोर होकर, भगवान शिव नाच रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से अपने प्रभु की महिमा का गान कर रहे थे, जबकि उनके गण वाद्य-संगीत बजा रहे थे और "जय! जय!" का उद्घोष कर रहे थे। बड़े स्नेह से उन्होंने नंदीश्वर जैसे अपने सहायकों और देवी उमा की स्तुति की, जो कुशलता से ताली बजा रही थीं। यह सब देखकर नारद प्रसन्न हुए। अपनी वीणा बजाते हुए और सम्मान में सिर हिलाते हुए, उन्होंने कई बार पुकारा, "आप कृष्ण की कृपा के सबसे बड़े पात्र हैं!" और उन्होंने मधुर वाणी में भगवान शिव को वह सब कुछ कह सुनाया जो उनके पिता भगवान ब्रह्मा ने उन्हें बताया था।
 
Sri Parikshit said: Arriving at Shivaloka, Narada Muni saw from afar Lord Shiva, Sri Hara, who had just finished worshipping Lord Sankarshana, Sri Hari. Overwhelmed with emotion, Lord Shiva danced and loudly sang the glories of his Lord, while his followers played musical instruments and shouted, "Jai! Jai!" With great affection, he praised his assistants, Nandishvara, and Goddess Uma, who was skillfully clapping. Narada was delighted by this. Playing his veena and nodding in respect, he called out several times, "You are the greatest recipient of Krishna's grace!" and in sweet voice, he recounted to Lord Shiva everything his father, Lord Brahma, had told him.
तात्पर्य
भगवान शिव ने अभी-अभी उन्हें देवता, भगवान संकर्षण की पूजा अर्चना समाप्त की थी। उन्होंने जिस तरह पूजा अर्चना की थी, वैसी ही नारद ने पृथ्वी पर प्रयाग मे देखी थी, लेकिन पूजा के अंत मे भगवान शिव में उस आनंद का भाव उत्पन्न हुआ जिसकी व्याख्या यहाँ इस छंद मे की गयी है। परमेश्वर की देवता की पूजा अर्चना शुरुआती लोगों को और उन्नत लोगों को दोनों तरह के लोगों को आकर्षित करती है। लेकिन पूरी तरह से आत्म-साक्षात्कार प्राप्त वैष्णव अपने पूजनिय देवता के साथ घनिष्ठ संबंधों का आनंद लेते हैं। ऐसे वैष्णवों को भगवान द्वारा उनकी भक्ति के छोटे से छोटे कार्य को स्वीकार करने मात्र से ही गहरा आनंदित करने का भाव आता है। इस प्रकार नारद ने भगवान शिव को संकीर्तन की तन्द्रा मे देखा, वे भगवान संकर्षण के प्रति ऐसी स्तुति कर रहे थे जैसी कि श्रीमद-भागवतम (5.17.18) के पांचवें खंड मे दर्ज हैंः

भजे भज्जन्यारण-पाद-पंकजम्

भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम्

भक्तेष्व आलम् भाविता-भूत-भावनम्

भवपहं त्वा भव-भावम ईश्वरम्

“हे मेरे भगवान, आप ही पूजा करने के योग्य व्यक्ति हैं, क्योंकि आप भगवान के परम व्यक्तित्व हैं, सभी ऐश्वर्यों के भंडार हैं। आपके सुरक्षित कमल चरण ही आपके सभी भक्तों के सुरक्षा का एकमात्र स्रोत हैं, जिन्हें आप अपने विभिन्न रूपों मे प्रकट होकर संतुष्ट करते हैं। हे मेरे भगवान, आप अपने भक्तों को भौतिक अस्तित्व के चंगुल से मुक्ति दिलाते हैं। लेकिन गैरभक्तगण आपकी इच्छा से ही भौतिक अस्तित्व मे उलझे रहते हैं। कृपया मुझे अपने अनंत सेवक के रूप मे स्वीकार करें।”

क्योंकि भगवान शिव भगवान के व्यक्तित्व के अवतार हैं, और भगवान शिव और भगवान के व्यक्तित्व इसलिए एक ही हैं, तो भगवान शिव को भौतिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर शुद्ध होने के लिए भगवान संकर्षण की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। भगवान शिव भक्तिपूर्ण सेवा के पारलौकिक स्वाद के बारे मे संसार को शिक्षित करने के लिए आम उपकरणों के साथ बाहरी रूप से पूजा करते हैं।

ब्रह्मा को भी भगवान का अवतार माना जाता है, लेकिन शिव और ब्रह्मा दोनों की स्थिति समान नहीं हैं। भगवान शिव विष्णु से एक अधिक शाब्दिक अर्थ मे भिन्न नहीं हैंः ब्रह्मा का पद लगभग हमेशा एक जीवी के द्वारा ही ग्रहण किया जाता है, जबकि कोई भी जीव कभी भी शिव की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता।

प्रकट शास्त्रों के कई कथन भगवान शिव को भगवान विष्णु से भिन्न रूप मे नहीं मानते हैं। उदाहरण के लिए, पदम पुराण (ब्रह्म-खंड 25.15) मे, भगवान विष्णु के पवित्र नामों के ख़िलाफ़ दस अपराधों के वर्णन मे, हम पढ़ते हैंः

शिवस्य श्री विष्णोर य इह गुण-नामदि-सकलम

धिया भिन्नं पश्येत स खलु हरि-नामहित-करः

“जो कोई भी भगवान शिव के गुणों और नामों और श्री विष्णु के गुणों और नामों मे कोई अंतर देखता है, वह हरि-नाम का विरोधी है।” ब्रह्मा और विष्णु की भिन्नता के बारे मे इस तरह का कोई आदेश नहीं है।

अधिकृत शास्त्रों मे कहा गया है कि वसिष्ठ जैसे व्यक्ति, जो कि निश्चित रूप से परिमित जीव हैं, भविष्य के जीवन मे अपने ब्रह्मांड मे भगवान ब्रह्मा बनेंगे। सैद्धांतिक रूप से कोई भी जीव आत्मा ब्रह्मा के पद को प्राप्त कर सकता है। जैसा कि भगवान शिव ने प्रचेताओं को बताया थाः

स्व-धर्म-निष्ठः शत-जन्मभिः पुमान

विरंचताम एति ततः परम् हि माम

“एक व्यक्ति जो बिना किसी विचलन के, सौ जन्मों तक अपने कार्यगत कर्तव्य का पालन करता है, वह ब्रह्मा के पद को लेने के योग्य बन जाता है, और यदि वह इससे अधिक योग्य बन जाता है तो वह मेरे, भगवान शिव के करीब आ सकता है।” (भागवत 4.24.29) इन शब्दों का कथन है कि एक जीव भगवान शिव मे शामिल हो सकता है, यह नहीं कि वह शिव बन सकता है। नारद ने भगवान शिव को परमेश्वर की कृपा के प्राप्तकर्ताओं की अपनी खोज मे शामिल किया है क्योंकि भगवान शिव अपने भक्त रूप मे भगवान का एक विशेष अवतार हैं।

लॉर्ड शिव के अनुयायी जिन्हें नारद ने शिवलोक मे देखा, वे सभी महान वैष्णव थे जिन्होंने अपने गुरु के विष्णु-भक्ति के भाव को गहराई से आत्मसात किया। भगवान शिव ने विशेष रूप से उनकी कलात्मक संपत्ति की प्रशंसा की, विशेष रूप से उनकी पत्नी पार्वती की ताली बजाने की, क्योंकि उनका प्रदर्शन सीधे शुद्ध भक्ति से ही प्रकट हुआ था।

यह सब देखकर नारद भी पागल हो गया। वह इतने उत्साह से नाचे कि वह दंडवत प्रणाम नहीं कर सके, और चूँकि वह अपनी वीणा बजाना बंद नहीं करना चाहते थे, उन्होंने बस अपना सिर हिलाकर सम्मान व्यक्त किया। फिर, भगवान शिव के व्यवहार की स्वीकृति दिखाने के लिए कुछ कहना चाहते हुए, उन्होंने ब्रह्मा द्वारा उन्हें बताई गई भगवान शिव की महिमा के बारे मे बताना शुरू किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)